Aye...khuda...
हर रूह में तू बसता है ...ऐ ख़ुदा ,फिर क्यों रूह से जिश्म होते है जुदा,
ढूँढा तुझे मंदिर ,मस्जिद के अंदर,....जब भी पाया खुदको बीच समंदर !!
आयत का हर लब्ज़,याद मुझे ज़ुबानी हैं !
फुर्सत में बैठ कभी,तुझे भी अपनी सुनानी हैं !!
माना फ़रयादी की भीड़ बहुत है,सबको अपनी प्यास बहुत है,
एक सी यहाँ जिंदगानी है,ज़ख्मों से ज्यादा गहरे घाव की कहानी हैं !!
तौफा दिया ज़िंदगी का तूने,जिसके कई पन्ने है अनकहे - अनसुने,
ज़िंदगी तो है पर न वो रवानी है,जो सुना सकूं ना ऐसी कोई कहानी है !!
"नाज़ तुझपे फिर भी ज़िंदगानी है,..समझते -समझते तुझे गुज़र जानी हैं "
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