ओ कान्हा.......,
जानें क्या सूझी तुझको....प्रीत क्यों जगाई मुझको,
तू भी तो तरपा होगा..... राधे दर्शन को तरसा होगा !
मन बनाकर..... कई दफ़े ख़ुद पर बरसा होगा !!
देख छवि आँखों में तेरी.... छलके आँसू पलकों से मेरी,
सुध - बुध सबने खोई...... सुन बाँसुरी की धुन तेरी !!
राधा तेरी जया है..... मीरा अदभुत माया की काया है,
जोगन से जग करे सवाल..... बता तेरा जहां में कौन है ?
मुस्कुरा कर आज भी...... कुंज बिहारी खड़े क्यों मौन हैं !!
जग से न अब आशा है..... बदल गयी प्रेम की परिभाषा है,
देखो तो लगता है...... हर तरफ़ चारों धाम लगे हैं !
श्याम दिल में नहीं..... ईट की दीवारों में क़ैद घनश्याम पड़े है !!
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