Thursday, April 16, 2020

Seedhi...

जाने छत कहाँ हैं........ 

इक सीढ़ी और साल चढ़ गया........ 

........ जाने कहाँ छत ज़िंदगी से दूर गया

आँगन की दरख़्त पर लगी मैं सोचूँ ........ 
  
इंसा क्या है ?

मैं गर लकड़ी का टुकड़ा तो वह मिट्टी का पुतला हैं....... 

अलग ही कुछ नाता है वो मुझे काट बनाता हैं.......
   
मैं उसे चढ़ते - उतरते........ 

सुख - दुःख का दृश्य दिखता हूँ.........

पीढ़ी दर पीढ़ी यही हाल हैं......... 
  
चढ़ाई अच्छी लगती है जीवन में सिर्फ़ ऊँचाई 

सच्ची लगती हैं....... 

यौवन इन्हें प्यारा हैं होता ये पर पारा हैं....... 

चढ़े तो ख़रा सोना है उतरे तो ख़ारा पानी हैं........ 

सच से इसकी अभी भी दूरी हैं.......

जीवन मृत्यु इक दुजे बिन अधूरी हैं......... 
  
एक बस ईश्वर हैं.........

........ बाकि सब नश्वर हैं !!

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